जिंदगी जीने का सलीका, वक्त रहते सिखले ये आदम
कहीं ऐसा न हो कि वक्त से पहले जिंदगी निकल जाए..
जब बच्चे छोटे होते हैं,
तो उनके दिल बड़े होते हैं,
और जब वे बड़े होते हैं,
तो उनके दिल छोटे हो जाते हैं..
भगवान हर जगह है…
ये तो सब मानते हैं…
फिर भी क्यों उसे तक पहुँचाने के लिए… क्या–क्या बनाते हैं…
क्या भगवान को मानने वाले ही… उसके न होने का भ्रम फैलाते हैं…
उसको देखने का तरीका, शायद हमको पता नहीं,
जो हम कहते हैं कि वो है, पर दिखाई देता नहीं।..
बच्चे भगवान का रूप होते हैं ये तो सब मानते हैं,
पर यही भगवान के रूप बड़े होने पर अपने भगवान को बचाने के लिए लड़ पड़ते हैं …
क्या बताऊँ, फितरत–ए–आदम,
जो दूसरों के ग़म को कुछ पल नहीं सुन सकता,
वो अपने एक ही ग़म को सालों–साल धोते रहता है…
कम्बख़्त इन हाथों से तो एक लकीर नहीं निकलती थी…
जाने क्या जादू था तेरे हाथों में…
जो तूने इन्हें छूकर, ऐसी तहरीर सिखा दी…
सब उससे कुछ न कुछ अपनी सुनाना चाहते…
क्या अजीब सी चुप्पी होती है उसके बोलने में…
जब वो बोलता है तो कोई सुनता ही नहीं…
वो जानता है कि तुम्हें उसकी फ़िक्र होती है…
और इसी बात से, उसे भी तुम्हारी फ़िक्र होती है…
तो वो तुमसे बेवजह लड़ता है… कोशिश में कि तुम उसकी फ़िक्र कम करो…
ऐसी फ़िक्र तुम्हारी… तो तुम्हारे… बाप को ही होती है…
ये दिल… मुझे डर है…
जो उसका ज़िक्र…. सामने से आए..
कहीं… तू ऐसे न खो जाए कि यूँ ही आँखों पे… नमी सी छाए..
और लोग उसे… बेवजह बदनाम कर जाएँ…
जो एक चेहरे पे दिखाई देती है
एक आदमी की शक्ल होती है…
जो उसकी हरकतों से दिखाई देती है
एकसौ एक आदमी की अकल होती है…
यूँ ही ज़मीन… कीचड़ बन गई है…
यहाँ कोई और फूल खिलता नहीं है…
यूँ ही हैरान हूँ मैं ज़िंदगी से…
आईना देख कर… बस ठहर जाता हूँ…
कोई जादूगर… क्या किसी को गायब करेगा…
ऐसा जादूगर है ये पैसा,
जो तुमसे इसे लेता है…
तुमसे दूर हो जाता है…
मंज़िल दिख रही है तो आ भी जाएगी…
तुम चलते रहो, रही है मंज़िल पर…
तुम्हारा वक्त आएगा यहाँ से निकलने का…
तुम कपड़ों की पेटी बंद करके तो बैठो…
ये कैसी कहानी लिख रहा है तू…
तेरे किरदार क्यों रंग बदल रहे हैं…
एक तरफ धूप है, एक तरफ पानी है।
मौसम ने करवट बदली जैसे ज़िंदगी है।
ज़रा कलम को नज़ाकत से फेर तो सही…
मेरे किरदार का रंग बदलने के लिए….
उन किताबों को काबिले जब्त समझे,
जिन्हें पढ़कर लोग मोहब्बत भुला दें।
सब, तुमसे हर वक्त कुछ न कुछ मांगते रहते हैं…
और तुम मुझसे जब बात करते हो तो लोग मुझे पागल कहते हैं…
हम उसे पाने को यहाँ–वहाँ शोर करते हैं,
वो तो हर वक्त हमारे सामने ही होता है…
वो हमें पुकारते ही रहता है…
पर हमारे शोर उसे हमसे और दूर कर देते हैं…
कुछ किताबें भी कमाल करती हैं जनाब…
ऐसे सवाल का जवाब देती हैं…
जिसकी उनसे उम्मीद नहीं होती…
सिर्फ़ दो ही कारण होते हैं किसी के झूठ बोलने के लिए…
या तो वो सच बोलने के लिए तैयार नहीं होते।
या तो तुम सच सुनने के लिए तैयार नहीं होते…
एक जोहरी था जो कर्ज़े में घिरा,
एक हीरा था उसके पास, बचा था जीवन का एक सहारा।
बेचने चला अपने सपनों का अकेला हीरा,
मिला एक सौदागर, जो बस अपना अक्स दिखने लगा वहाँ पूरा।
उसने समझा वो आईना है, झटक दिया उसे बेनियाज़,
जोहरी का हीरा बिखरा, टुकड़ों में बिख गया जज़्बात का राज।
अब जोहरी ढूंढ रहा है अपने हीरे के टुकड़ों को,
और सौदागर चमक रहा है, उस रोशनी में,जो कभी थी जोहरी का नूर।
हमारे दिमाग और दिल कितने जुदा हैं…
दिमाग है, जिसे रूह के पार जाने की तमन्ना होती है…
दिल है, जिसके रूह को प्यार की तमन्ना होती है…
तस्वीर बनाने की उम्मीद में लकीर खींचते रह गए…
ईश्वर मनाने की उम्मीद में फ़क़ीर फेंकते रह गए…
कैसे बरकरार रखें बच्चों की मासूमियत…
स्कूलों में भेजते हैं, उन्हें इंसानियत सिखाने…
मगर…
वहीं से मज़हबों की दीवारें सीखकर आते हैं…
बस इतनी सी फ़रियाद करता हूँ…
कि जिन्हें सिर्फ़ मैं उनके बुरे वक्त में याद आया…
उनको मैं कभी फिर याद न आऊँ…
मिठा कर कुछ संदेशों को…
ये बताना नहीं चाहता…
कि मैं तुमसे क्या छुपाना चाहता हूँ…
मुझे बस अच्छा लगता है…
पूछना तुम्हारा, क्या मिटा दिए…
धर्म से कोई खेल भला…
जिसमें हित कराने को नियम कर सकूँ, सुधार…
कौन कहता है कि मशीनों को दिल नहीं होता ..???
आपके पहले ही अक्षर से ये आपके दिल की बात समझ लेती हैं…
क्या कोई इंसान इस क़दर दिली हो सकता है…. ???
जो एक इशारे से ही दिल की गहराइयों तक पहुँच जाए…???
क्यों शिकायत करूँ मैं किसी से…
मैं खुद की शिकायत सुनता नहीं।
क्यों बुरा मानूँ मैं किसी के बेरुख़ी से…
मुझे बुरा बोलकर कोई चैन से सोया नहीं…
ये सवाल अजीब नहीं होते…
कभी इनके जवाब कोई किताब देती है…
कभी किसी की कोई बात…
कभी किसी के हालात…
कभी किसी के औकात…
कभी खुद की ही अंदर की आवाज़…
ज़िंदगी क्या है… ???
सही जगह पे…
सही लोग के साथ…
सही समय का होना…
हम खुद को बहुत समझदार समझते थे..
फिर हमने कई मूर्खों को बिगड़ते–बनते देखा..
तो हम खुद को बहुत मूर्ख समझने लगे..
फिर हमने कई समझदारों को पंखों से लटकते देखा..
कैसे यार हो यारों…
तुम मेरा नाम तक ठीक से नहीं लिखते…
एक ज़माने में वो मेरा नंबर जीनियस कर के लिखती थी…
बनाया है जिसने ये सारी कायनात…
उसको बनाने के तू तौहीन न कर…
बनाया है जिसने ये सारी कायनात…
उसके तख़लीक की तू तौहीन न कर…
दुनिया का वजूद मोहब्बत से है…
नफ़रत – तिज़ारत की तू तौहीन न कर…
बेगानों के बीच में मैं अपनों की धुन कर बैठा…
जो कभी अपने थे ही नहीं…
उनमें मैं अपनों की धुन कर बैठा…
वो बहुत नमकीन समंदर था..
उसी से मैं अपनी प्यास बुझाने की धुन कर बैठा…
डर–डर के इतना डरा हर चीज़ से…
अब तो डरना भूल गया…
बहुत गहरा समंदर सा हुआ करता था मैं…
अब तो आँसू सा रह गया…
चार लोग क्या बोलेंगे, इसका डर सबको लगता है…
तुम करो जो मर्जी, तुम्हें करना है…
दो तुम्हें सबक लेंगे…
दो तुमसे सबब…
नसीब है, जमीं पे आ गया हूँ…
ताल्लुक मेरा आसमान से है …
जमीन पे जुगनू सा बन गया है निरज…
वरना सूरज के खानदान से है….
कुछ चीजें सिर्फ़ काबिल होने से नहीं मिलती हैं जनाब…
उनके लिए पागल होना पड़ता है।
कभी किसी का लहज़ा ऐसा दिखे,
कभी रुबाब से बात करे,
कभी अदब से बात करे,
तो समझो वो सभी मतलब से बात करे।
अपने आप को मिटा के जाना है तुम्हें…
तुम मुझे मिटा हुआ समझ रहे हो…
फिर से अपने आप को बनाकर दिखाना है तुम्हें…
अब तो निकल आओ अपने अंदर से…
कब से बंदर बने बैठे हो…
मैं किसी आग से नहीं जलता।
बस जलता हूँ तो उस मोबाइल से,
जिसे तुम दिन भर देखा करते हो…
अगर बदला न रहता मैं, तो मैं क्या चीज़ हूँ यह बताकर बदला जरूर लेता मैं…
पर अब मुझे लोगों की समझ सुधारने की आदत नहीं, इतना तो बदल गया हूँ मैं..
तो तुम जो मुझे समझ रहे हो, वही हूँ मैं।
इसे ही मेरा बदला समझो…
मेरी नाकामी से मेरी औक़ात न नापिए…
मेरी हँसी से मेरी ख़ुशी न नापिए…
मेरी चुप्पी से मेरे ग़म न नापिए…
मेरी हिम्मत से मेरी ताक़त ज़रूर नापिए…
बात सुकून की चल रही थी…
मैं उसकी साँसों की कर आया…
फिर बात नशों की चलने लगी…
मैं उसकी आँखों की कर आया…
हमें भ्रम है, हम सब जानते हैं…
कुछ बातें जब हमें पता चलती हैं,
तो पता चलता है हम ख़ाक जानते हैं…
तेरा ख़याल हर वक्त में रे, जहाँ में चलता है…
तो फिर कैसे कहूँ वक्त ख़राब चल रहा है…
जो आए नहीं हमारे बुलाने से, उनसे क्या ही मतलब है हमें…
जो आए हैं, उनके लिए ये शाम तैयार है… हर जाम तैयार है…
कोई हिन्दू, कोई मुस्लिम, कोई ईसाई है…
सब ने इंसान न बनाने की कसम खाई है…
जीनियस बोला करती थी वो मुझे अकेले में…
पागल बुलवा गई जमाने से…
तू तेरी दस्तक का हाल पूछती है मेरे दिल से…
मेरे दस्तकत में एक दिल बनता…
कभी पूछ तो किससे… कि किसका है…??
कोई खुद को समंदर बुलाता है, कोई आसमान…
जाने किसको बना रहे हैं…
वो जानता है, तुम हो बस एक इंसान।
मैं पूछता हूँ ज़िंदगी से,
कि बातों से समझा मुझे ज़िंदगी को…
वो बिलकुल मेरे जैसे है, मेरी बात नहीं समझती उसे…
इसलिए हादसों से सिखाती है ज़िंदगी को…
माँ के जाने से खाली हुआ एक कोना…
जहाँ सिर्फ़ उसकी दुआओं का सोना …
ना रूप रहा, ना आवाज़ बची…
पर हर साँस में बस उसकी याद सच्ची…
इस क़दर हुनरमंद तो थे ही नहीं हम कि हो गया है दुश्मन आसमान हमारा…
ज़ख्मों ने दिल के रंग छुपा दिए,
पर रंग तो अभी भी इन रगों में जीते हैं…
जब हवा हल्का सा छुएगी,
ये रंग फिर से आसमान रंगेंगे…
अपने ज़ख्म की आग को रोशनी बना डाला,
डर से भरे सफ़र को ही ज़िंदगी बना डाला …
जो टूट कर भी दूसरों को संभाल ले,
वही इंसानियत का असली मिसाल बना डाला …
मंज़िल से ज़्यादा मुसाफ़िर का हौसला ज़रूरी है,
ज़िंदगी जीने के लिए सांस नहीं, मक़सद ज़रूरी है ….
खुद को पहचान, अपने मन को समझ,
तभी जीवन के राज खुलेंगे, डर और ग़म मिटेंगे…
आसमान को छू न पाए तो क्या,
ज़मीन पर चल के भी सपने पूरे होते हैं…
मंज़िल मिले या न मिले ये तो मुक़द्दर की बात है..
हम कोशिश भी न करें ये तो ग़लत बात है…
तूफ़ान से लड़ने का जज़्बा अगर दिल में हो.
तूफ़ान भी रास्ता बना देता है…
ज़िंदगी की राहों में अँधेरा भी ज़रूरी है,
रोशनी का असली मतलब तभी समझ आता है…
कुछ ख्वाबों का सच होना ज़रूरी नहीं…
कुछ लोगों का अपना होना ज़रूरी नहीं…
बस इतना हो कि याद आए तो दर्द न दे…
वही तो प्यार है, कहना ज़रूरी नहीं….
धरम से पहले इंसान बनना सीखेंगे,
भेद से नहीं, दिल से दिल को जोड़ना सीखेंगे..
डर के साये में नहीं, समझ के रोशनी में जियेंगे…
आज से खुद से वादा करते हैं – इंसान हम सब एक हैं…
जिंदगी एक पल है, ना कल की है ना कल की होगी,
जो इसे आज में जी गया, उसकी हर धड़कन गुलाबी होगी…
कुछ लोग वक़्त का गम करते रह गए,
कुछ ने वक़्त में जीना सीख लिया,
फर्क सिर्फ इतना था दोस्त,
किसी ने सोच को रोका, किसी ने सांसों को महसूस किया…
ख्यालों का तो काम है आना–जाना बस,
फैसला हमेशा तुम्हारा हो, ये याद रखना…
डर भी एक सोच है, ख्यालों का एक जाल,
सच में जीना हो तो, बस खोल दो ये बवाल….
डर के आँगन में ख्याल फूल बनके खिलते हैं,
पर हकीकत की धूप में सब परछाइयाँ पिगलती है,
जो मन को समझ ले वो दुनिया जीत जाए,
वरना सोच–सोच के ही जिंदगी निकलती है…….
ना मजहब, ना जात, ना भेद का फसला, इंसान सब एक है, बस यहीं है असली मसला……
